How GPS Tracking Works:
दोस्तों, क्या आपने कभी भी Amazone.in या फिर अन्य कोई ज़रिये ऑनलाइन सामान मंगवाया है? क्या आपने कभी Swiggy या Zomato से घरपे खाना order किया है? दोस्तों, क्या आपने कभी अनजानी जगह पे रास्ता Google Map में ढूंढा है? या फिर कभी Google पर आसपास की दुकाने, पेट्रोल पंप जैसी कोई चीज़े find की है अगर आपका जवाब है है तो आपने ज़रूर GPS का यूज़ किया है। दोस्तों, GPS का पूरा नाम GLOBAL POSITIONING SYSTEM है। हम इस आर्टिकल में GPS की हिस्ट्री, वर्किंग और रीजनल GPS के बारे में जानने वाले है
दोस्तों, आप GPS के बारे में वीडियो देखना चाहते है तो निचे वाला वीडियो हमारी तरफ से रेकमेंडेड वीडियो है जो की आप देख सकते है....
History of GPS
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| History of GPS |
दोस्तों, ये बात है 1985 की तब अमेरिकन आर्मी को अपने कॉर्डिनेट्स ढूँढ़नेमें बहोत परेशानी जेलनि पड़ती थी। यहाँ पे क्या होता था की अमेरिकन आर्मी को ग्राउंड लेवल पर काम करना होता था। जब वे अपनी एक बटालियन को किसी मिशन पे भेजते थे तब उस बटालियन की पिनपॉइंट लोकेशन मालुम करने में बहोत मुश्किल होती थी। अब ये पोजीशन से अमेरिकन एयर फाॅर्स भी उनको मदद दे सकती थी। लेकिन अगर उनके पास पिन पॉइंट लोकेशन ना हो तो यहापर आर्मी की हेल्प करना कठिन हो जाता था।
इसी वजह से अमेरिकन आर्मी और एयर फाॅर्स ने GPS यानी की GLOBAL POSITIONING SYSTEM की इजात की। अब क्या होता था की अमेरिकन आर्मी के पास एक डिवाइस होता था जिसके कारन उनकी पिनपॉइंट लोकेशन मिल्ट्री बेस पे बैठे ऑफिसर्स को मिल जाती जिससे मुसीबत के समय में उनतक ज़्यादा जल्दी मदद पहुंचे।
जब साल 2000 आया तब तक अमेरिकन सरकार ने इस चीज़ को पब्लिक कर दिया। जब GPS सिस्टम पब्लिक हुआ तब इसकी एक्यूरेसी बहोत अच्छी नहीं थी लेकिन जैसे जैसे इसमें सुधार होते गए और इसमें डेवलपमेंट होता गया इसकी एक्यूरेसी बढ़ती गयी और इसका यूज़ भी बढ़ता गया। हलाकि आज ये इतना पॉपुलर हो गया है की कोई भी स्मार्टफोन आप उठालो उसमे आपको GPS मिलेगा ही मिलेगा।
ये जो बला है जिसका नाम GPS है (अभी हमारे पास इसकी पूरी जानकारी नहीं है इसलिए ये हमें बला ही लगती है) उसकी एक्यूरेसी 10 मीटर्स की है। यानी की अगर कोई GPS से चाहे तो आपकी घडी में कितना बजा है वोह भी एक दम HD क़्वोलिटी में देख सकता है बस शर्त ये है की आप खुले आसमान के निचे खड़े होने चाहिए। लेकिन ऐसा करना भी आखिर कोन चाहेगा ये भी एक सोचने वाली बात है।
वैसे देखा जाए तो ये GPS हमको बहोत ज़्यादा हेल्प भी करता है। आप अगर ऑनलाइन खाना ओर्डर करते हो तो आपको पता होगा की वोह आपसे आपका पता दो तरीको से मांगते है एक आप अपना पता लिखके उन्हें बता सकते है और दूसरा की आप गूगल मैप में जो लाल पिन होती है उसके ज़रिये मैप लोकेशन डाल सकते है। हम लोग तो है आलसी इसलिए हम वोह दूसरा तरीका ज़्यादा पसंद करते है क्योकि उसमें कोई महेनत नहीं है और वोह फटाफट हो भी जाता है। और एक पिन के सेट करनेसे आपका ऑर्डर आपके घर तक बिना कोई दिक्क्त पहुँच भी जाता है।
आपको क्या लगता है सिर्फ पिन हिलनेसे उनको आपका लोकेशन मिल जाता है। अगर आप ऐसा सोच रहे है तो जनाब आप सोच रहे है। उसके पीछे भी कई साड़ी साइंस लगी हुई है। जो की कोई राकेट साइंस नहीं है सिंपल है जो की आप ये आर्टिकल पढ़के भी समज सकते है तो चलिए ये GPS की रॉकेट साइंस भी समजलेते है।
#GPS की रॉकेट साइंस
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| Science of GPS |
आपने कभी ये खबर पढ़ी होगी या सुनी होगी की अमेरिकाकी स्पेस एजेंसी NASA ने आज ये वाला कृत्रिम उपग्रह छोड़ा अंतरिक्ष में या वो वाले कृत्रिम उपग्रह छोड़े । तो ये जो कृत्रिम उपग्रह उपर छोड़े जाते है वोह आखिर ऊपर जाके करते क्या होंगे।
अब ये जो कृत्रिम उपग्रह यानी की सेटेलाइट जो है वोह कई तरह के होते है। जैसे की कम्युनिकेशन सेटेलाइट। जिसके बारे में हम इस आर्टिकल में जानने वाले है क्योकि इनकी बदौलत ही हमारे GPS काम करते है।
अमेरिकाने ऐसे 25 के करीब कम्युनिकेशन सेटेलाइट अंतरिक्ष में हमारी पृथ्वी के चारो तरफ 20000 किलोमीटर पे टंग रखी है। ये जो उपग्रह है इनका काम हमारी पिनपॉइंट लोकेशन ढूँढना है। हमारी यानी की जो GPS का इस्तेमाल करे उनकी। यहाँ पे हम अपने स्मार्टफ़ोन की मददसे समझेंगे की GPS काम कैसे करता है ये सब उपग्रह के एक काम करने का तरीका होता है जिसके बारे में हम आगे डिटेल में जानते है।
Working Of GPS
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| working of GPS |
ये जो GPS नामक चीज़ है उसके काम करनेका जो तरीका है वोह थोड़ा पेचीदा है। हर वोह चीज़ जोकि एक दम परफेक्ट होती है वोह कही न कही पेचीदगीसे भरी होती है। और ये तो ठहरा विज्ञान इसलिए इसको हमें example या फिर प्रयोग के ज़रिये समजना चाहिए ताकि आसानी से हमें समज आ जाए क्योकि ये भाषाए समझ ने में आसान होती है। तो चलिए इस GPS के विज्ञान को भी एक example से समझने की कोशिस करते है।
मान लीजिये जनाब आप दिल्ली घूमने गए है (अब हमने कहा है तो मान लीजिये) और आप कोई ऐसी जगह पे है की वहा कोई नाम पता उस जगह का नहीं लिखा और आपको पता करना है की आप कहा है। तो आप ये पता कैसे करोगे? चलिए हम बता देते है की आपको आपके आसपास जो लोग आपको मिलेंगे उनसे पता पूछना है की आप इस वक्त कहा है ओके तो चलिए आपके आसपास के लोगो से पूछते है आपका पता।
आपको जो पहला आदमी मिला उनसे आपने पता पूछा तो उसने एक रिडल यानी पहेली में आपका जवाब दिया की आप जहा खड़े है वोह पॉइंट A है और आप पॉइंट B से 200 मीटर की दूरी पर खड़े है। इतना बताके वह जनाब तो खिसक लिए और आप हो गए कंफ्यूज। अब आपके पास एक ही उपाय है की आप किसी दूसरे से अपना पता पूछे। तो चलते है एक और नज़दीक खड़े चाचा के पास और आपका पता पूछते है चलिए।
जब आप उस चाचा के पास पहुंचे और चाचा को पूछा की बताओ चाचा हम इस वक्त दिल्ही में कहा खड़े है तो चाचा ने भी आपको आपके हाथ में एक पहेली थमादि। जिसमें लिखा था की आप पॉइंट A पे खड़े है और आप पॉइंट C से 100 मीटर दूर है। अब आप फिर हो गए कंफ्यूज और आपने अपना शिर खुजाना सुरु कर दिया। आपके पास अब एक ही चांस और उपाय बचा है की आप जाके तीसरे आदमी के पास जाके अपने पता पूछे। तो चलिए उनके पास भी हो आते है।
जो तीसरा आदमी है उसको जब आपने अपना पता पूछा तो उसने बताया की आप पॉइंट A पे खड़े है और आप की और पॉइंट D की दुरी लगभग 500 मीटर के करीब है। लो अब तो हो गया कबाड़ा अब आपको ये पता पड़ेगा की ये जो तीन पहेलियाँ मिली उससे आप कैसे अपना पता खोजते है। थोड़ा सोचलो अगर आपको चल जाए तो निचे कमेंट कर देना। और इतना सोचने के बाद भी नहीं पता चला तो आगे आपको पता चल जाएगा। तो चलिए जान्ते है की वोह पता कैसे मिलेगा।
अब इन पहेलियों से लोकेशन ढूंढने के लिए आपको करना क्या है आइये जानते है। सबसे पहले आपको एक पॉइंट A निर्धारित करना पड़ेगा और जो और तीनो पॉइंट्स है इसको भी निर्धारित करना पड़ेगा। पॉइंट A से पॉइंट B की दुरी करीबन 200 मीटर्स है यानिकि आपको पॉइंट B से 200 मीटर का एक सर्कल यानी की दायरा बनाना पड़ेगा।
इसी तरह जो पॉइंट C है उसकी दुरी करीबन 100 मीटर्स की है यानी की आपको ये जो पॉइंट C है उसके आसपास करीबन 100 मीटर्स का एक सर्कल की जिसे उस पॉइंट C का दायरा माना जाएगा उसे बनाना पड़ेगा। इसके साथ ही ये जो पॉइंट B और पॉइंट C के जो दो सर्कल है वोह आपस में कहीं न कही अपने से दूसरे सर्कल को भेद रहे होंगे।
अब इसके बाद आपको पॉइंट D का दायरा बनाना पड़ेगा जो की पॉइंट A यानी की आप जहा है वहा से करीबन 500 मीटर्स की दुरी पे है। तो आपको पॉइंट D से 500 मीटर्स का एक सर्कल बनाना पड़ेगा। अब आप जैसे ही ये तीसरा दायरा यानी की सर्कल बनाओगे ये तीनो सर्कल्स का कोई एक भाग तो ऐसा होगा जो की कही न कही आपसमें मिलता होगा। ये जो आपसमें मिलने वाला एरिया है वोह एरिया में आप कही हो। यानी की वोह आपकी लोकेशन है। (सही तरीकेसे समझनेके लिए ऊपर दिया गया वीडियो ज़रूर देखे)
अब यहाँ पे जो मेने आपको example बताया ठीक वैसे ही हमारा GPS काम करता है। इस example में जो आप है वोह आप ही है जोकि अपने स्मार्टफोन की मदद से अपनी लोकेशन जानना चाहते है। जो बाकी के तीन लोगो से हमने पता पूछा वह अमेरिकाने जो कृत्रिम उपग्रह छोड़े थे वह है। जो आपने मेथड यूज़ की लोकेशन ढूंढने में वह आपका स्मार्टफोन और उपग्रह दोनों के साथ मिलकर होती है। जिससे आपको अपनी पिनपॉइंट लोकेशन मिल जाती है।
यहाँ जितने ज़्यादा उपग्रह से आपका स्मार्टफोन संपर्क बनायेगा उतनी आपको एक्यूरेसी ज़्यादा मिलेगी। अगर आपका स्मार्टफोन चार उपग्रह से संपर्क बनाले तो आप अपनी समंदर से ऊंचाई भी जान सकते है। यानी की जितना ज़्यादा उपग्रह है संपर्क उतना ज़्यादा एक्यूरेसी वाला रिजल्ट आपको देखनेको मिलेगा।
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| Google map with GPS |
दोस्तों, जब आप कोई ट्रिप पे जाते है और गूगल मैप में अपना लोकेशन या रास्ता देखते है तब जो एरो है वह आपके साथ साथ मूव होता है तो उसकी एक्यूरेसी भी अच्छी होनेका कारण यही है की आपका स्मार्टफोन आपके लोकेशन में तीन से ज़्यादा सेटेलाइट से संपर्क बनाए हुए रखता है।
अब यहाँ आपका मोबाइल सेन्डर और रिसीवर दोनों की तरह काम करता है। सेटेलाइट हर थोड़ी-थोड़ी देर में आपको सिग्नल्स भेजता रेहता है। जो की रेडियो सिग्नल्स होते है। अब ये सिग्नल्स आपका स्मार्टफोन रिसीव करता है और उसे वापस सैटेलाइट की और भेजता भी है। जिससे सेटेलाइट को आपकी करंट लोकेशन का पता चल जाता है और आपके स्मार्ट फोन में वोह डेटा वापस भेजा जाता है। जिससे आपको भी पता चल जाता है की आप कहा पे हो।
यहाँ पे ये साडी प्रोसेसस जो है वोह सेकंड्स में हो जाती है(अगर आपका इंटरनेट अच्छा हो तो) जिससे आपको ज़्यादा पता नहीं चलता। ये जो प्रोसेस है उसमे टाइम का बहोत बड़ा रोले होता है जिसको एक Atomic Clock ज़रिये हैंडल किया जाता है। तो चलिए जानते हो की ये Atomic Clock का जो हमने ज़िक्र किया वोह आखिर है क्या...
Atomic Satellite Clock
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| Atomic clock of satellite for GPS |
अब यह पे लोकेशन ट्रैकिंग जो पूरी प्रोसेस है वोह कुछ इस तरह से है की जो सेटेलाइट है वोह हर सेकंड 15-15 Bytes के सिग्नल्स हमारी पृथ्वी की और भेजता है जो की उसके भेजने का टाइम नोट किया जता है। अब वोह सिग्नल हमें है हमारे स्मार्टफोन में मिलते है और उसे हम वापस सेटेलाइट को भेजते है। सेटेलाइट वापस उसको रिसीव करता है और उसका टाइम फिर से नोट किया जाता है।
अब ये जो समय यहाँ पे नोट किये गये उसके ज़रियर यहा कॅल्क्युलेशन होती है और उसी के ज़रिये आपको आपकी पिनपॉइंट लोकेशन पता लगती है। अब ये जो पूरी प्रोसेस है उसमे टाइम का बड़ा महत्त्व होता है। जो की एक घडी के ज़रिये नोट किये जाता है।
अगर आप के पास कोई घडी हो तो आपको पता होगा की अगर उसकी बेटरी ख़त्म होने को है तो वोह सही टाइम नहीं दिखाती। अब ऐसा अगर सेटेलाइट में हो तो आपको आपकी सही लोकेशन नहीं मिलपायेगी इस वजह से वह कोई बेट्री से चलने वाली घडी की बजाये Atom यानी की अणु से चलने वाली घडी का इस्तेमाल होता है।
ज़्यादातर ऐसे सेटेलाइट का जीवनकाल 12-15 साल ही होता है लेकिन इस पुरे जीवन काल में जो एटॉमिक क्लॉक है उसमे मिली सेकंड का भी आपको तफावत नहीं देखनेको मिलता। इसलिए ऐसे सेटेलाइट में पारम्परिक बेटरी से चलने वाली घड़ी के बावजूद एटॉमिक क्लॉक का इस्तेमाल किया जाता है। जो की आपको परफेक्ट आउटपुट देती है।
अब ये तो हुई पुरे वर्ल्ड की बात लेकिन क्या आपको पता है की हमारे पास यानी की भारत के पास अपना GPS है जिसको NAVIC कहते है। जिसको रीजनल GPS भी कहते है। तो आइये जानते है NAVIC के बारे में...
NAVIC (Indian GPS):
दोस्तों, ये जा GPS है वह आपको पता है की अमेरिकन आर्मी उसको कंट्रोल करती है तो हमारे लिए यहाँ लिमिटेशंस आ जाती है लेकिन इसका उपाय हमारे ISRO ने निकाल है जो की है NAVIC. ये हमारा अपना पर्सनल
नेविगेशन सिस्टम है जिसको हम यानी भारतीय नागरिक और इंडियन आर्मी भी इस्तेमाल करते है। तो आइये जानते है NAVIC के बारेमें...
दोस्तों NAVIC का पूरा अंग्रेजी नाम है Navigation with Indian Constellation. NAVIC का हिंदी जो अर्थ है वोह है खलासी जो की समंदर में अपने जहाज़ चलाते है। ये जो नाविक है वो अमेरिकन GPS की तरीके से ही काम करता है लेकिन यहाँ पे जो सेटेलाइट्स यूज़ की जा रही है वह अपनी यानी की ISRO की बनाई हुई है। जो की इंडियन आर्मी और इंडियन लोगो की हेल्प के लिए बनाई गई है।
दोस्तों, जब कारगिल का युद्ध हुआ तब हम यानी की इंडियन आर्मी टोटली अमेरिकन GPS के ऊपर डेपेंडेंड थी जिसकी वजह से हमें (इंडिया को) ऐसा महसूस हुआ की हमारा अपना सेटेलाइट सिस्टम भी होना चाहिए जो की इंडियन आर्मी के लिए टोटली मददगार रहेऔर उसका डेटा किसी और के हाथ ना आये। इसलिए इस मुहीम की शुरुआत हुई और 2018 में NAVIC को लॉन्च किया गया।
दोस्तों जैसे की हमें पता है की अमेरिकन सेटेलाइट की वजह से GPS चलता है वैसे ही भारतीय सेटेलाइट्स की वजह से हमारा NAVIC काम करता है। अमेरिका ने इसलिए 25 सेटेलाइट लगा रखे है और नाविक को चलाने के लिए ISRO ने अभी 7 सेटेलाइट्स काम पे लगा रखे है और दो सेटेलाइट बैकअप के लिए है।
ये जो सेटेलाइट है उनसे इंडिया और उसके पड़ोस में आने वाले सभी देश का भी कवरेज मिलता है जो की इंडियन बोर्डेर के बाद 1500 किलोमीटर्स के क्षेत्रफल की कवरेज करता है। यानी की इससे भारत के अलावा पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे सभी देश कवरेज में आते है।
दोस्तों, ये सिस्टम दो नेविगेशन प्रोवाइड करता है एक नॉर्मल नेविगेशन जो की हमारे लिए यानी हम इंडियंस के लिए है जिसको हम मैप्स और रस्ते वगैरा खोजनेके लिए इस्तेमाल करते है। एक एन्क्रिप्टेड (Encrypted) सर्विस भी है जो की इंडिया के आर्मी और ख़ुफ़िया सर्विस को प्रोवाइड की जाती है जो की काफी खुफ़िआ और सुरक्षित होती है और एक्यूरेट भी।
दोस्तों, ये NAVIC सिस्टम हमारे स्मार्टफोन्स में भी अवेलेबल है अभी ये सिर्फ xiomi के फ़ोन्स में आता है लेकिन कुछ समय बाद ये सभी फ़ोन्स में अवेलेबल हो जाएगा ऐसा भी माननेमें आ रहा है। ये सिस्टम पारम्परिक GPS से भी एक्यूरेट है ऐसा टेस्ट में मालुम पड़ा है जो की इंडिया के लिए गर्व की बात है।
सारांश
दोस्तों, इस लेख में आप जाना की की GPS यानी Global Positioning System क्या है। इसकी हिस्ट्री के बारे में जाना की इसकी शुरुआत कैसे हुई और क्यों हुई। साथ ही आपने जानकी उसकी वर्किंग कैसे होती है उसके पीछे की साइंस को आपने एक आसान example के ज़रिये समझा और इसके इस्तेमाल से आप क्याक्या कर सकते है वोह भी जाना। और लास्ट में आपने अपने रीजनल GPS यानी की अपने इंडियन NAVIC के बारे में डिटेल में जानकारी प्राप्त की।
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Nice and detailed articles
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